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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ हेममयाकाशविस्तीर्णायां महाभुवि । सौहार्दादेव सिद्धस्य तस्येदमहमुक्तवान् ॥ १ ॥ त्वया न केवलं तावन्मयापि न विचारितम् । आव्याप्तिरहिता नाम न संभवति देहिनाम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उसके बाद आकाश के समान विस्तीर्णं सात समुद्र और साता द्वीपों के बाहर स्थित कांचनमय विशाल भूमि में मत्री के कारण ही मैंने उस सिद्ध से यह कहा-मित्र, अकेले आपने ही विचार नहीं किया हो ऐसी बात नहीं है, कितु मैंने भी विचार नहीं किया । साधारण लोगों की बात जाने दीजिये, जो बड़े-बड़े योगी हैं, उनको भी ध्यानपूर्वक सब विषयों में मनोयोग के बिना भूत, भविष्यत्‌ पदार्थों का परिज्ञान कदापि नहीं हो सकता

सर्ग सन्दर्भ

तिरानबेवाँ सर्ग समाप्त चौरानवेवों सर्ग दोनों का-श्रीवसिष्ठजी तथा उस सिद्ध का-सिद्धलोक में गमन तथा पिशाचों एवं देवताओं की केवल मन के अनुसार स्थिति, यह वर्णन।