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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । न दृश्यते विदेहत्वाद्भवान्व्योमवपुर्यदि । तत्कथं तेन सिद्धेन दृष्टोऽसि कनकावनौ ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

गुने वहाँ कोड नहीं देखता था, यह आपका कहना आपके ही पूर्व के कथन से विरुद्ध है। क्योकि अभी आपने पहले कहा है कि मे वहाँ प्रिद्ध से देखा गया / मैं अन्य प्राणियों को देखता था, आपका यह कहना भी अगत है, कारण कि मन की बाहर स्वतन्त्रता न होने से स्वप्न में अपने (७) ज्ञानमात्र में अवच्छेदकता सम्बन्ध से देह की कारणता के सदृश त्वक्‌ एवं मनके संयोगकी भी कारणता है, इसीलिए सुषुप्ति मे त्वंमनोयोग का अभाव रहने से ज्ञान का अभाव है। ऐसा जो नैयायिक प्रलाप करता है, वह मूर्ख है, उसके साथ आपको संभाषण करना ही नहीं चाहिए, क्योकि भाषण करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, “सुखमहमस्वाप्सम्‌ इत्यादि जाग्रत्‌काल में स्मृति होने से सुषुप्ति में भी सुखस्वप्नादिका ज्ञान तो होता ही है । स्वप्नेन शारीर मभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पूरुष एकहंसः।” इत्यादि श्रुति के साथ विरोध भी होता है तथा निमि के शाप से जब मैंने शरीर का परित्याग कर दिया, तो भी मुझे दुःख का अनुभव तो होता था, उसी के निवारण के लिये ब्रह्मा की आज्ञा से मिले हुए वरुण से उत्पन्न शरीर का मैंने ग्रहण किया था । मनोय पदार्थों का ही अवलोकन होता है इस आशय से श्रीरमचन्द्रणी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : महर्षे, आकाशमय शरीरधारी आप यदि विदेह होने के कारण यानी पार्थिव शरीर शून्य होने के कारण किसी के द्वारा नहीं दिखते रहे, तो फिर उस सुवर्णमयी पृथिवी में उस सिद्ध के द्वारा आप कैसे देखे गये ?