Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नचरो गेहे व्यवहर्ता न दृश्यते ।
तथा तदा न दृष्टोस्मि पुरस्थोऽपि नभोगतैः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस
प्रकार घर में सोये हुए स्वप्न मेँ विचरण करनेवाले स्वप्न में व्यवहार कर रहे पुरुष को उस घर के
दूसरे प्राणी नहीं देख पाते, उसी प्रकार उस समय आकाश में विहार करनेवाले देवताओं ने सामने
स्थित रहने पर भी मुझे नहीं देखा