Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
घ्नन्त्यदन्ति पिबन्त्याशु लघुसत्त्वबलं जनम् ।
बलं सत्त्वमथो जीवान्हिंसन्त्याक्रम्य चित्तकम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका यदि मरण के अनुकूल कर्माशय होता है तो मर्मस्थानों में पहुँचकर इनमें
कोई पिशाच शीघ्र प्राणियों को मारते हैं और स्वयं अपने ऋण के अनुबन्ध के अनुसार उसके
देहधातुओं का भक्षण करते, रुधिर आदि पीते तथा बल एवं सत्त्व को नष्ट करते हैं और चित्त में
आक्रमण करके जीवों को नष्ट कर डालते हैं