Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
न हि संकल्पितुः स्वेच्छा क्वचित्पर्यनुयुज्यते ।
तास्तथेच्छा विरिञ्चस्य तथा नाम तथोदिताः ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
उस खेत में उत्तम देवादिरूप रत्न ही पैदा होवें, यही संकल्प हिरण्यगर्भ को क्यो नहीं
हुआ, वृथा पाषाणरूप पिशाचादि जातियाँ पैदा करने का उनका क्यों संकल्प हुआ, यह आक्षेप
आप संकल्प करनेवाले विधाता की इच्छा के ऊपर कदापि नहीं कर सकते, क्योकि विधाता की वे
इच्छाएँ पैदा होनेवाले जीवों के पूर्वं जन्म की कर्मवासना के अनुसार ही हुई है, अतएव वे पिशाचजातियाँ
भी वैसी ही यानी अपने पूर्वजन्म की कर्मवासना के अनुसार ही उदित हुई हैं ।