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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवंस्तव देहोऽसौ पृथिव्यामणुतां गतः । भ्रान्तः केन शरीरेण सिद्धलोकांस्ततो भवान् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

कृटी में स्थित जो आपका स्थूल शरीर था, उसे उम्र शिद्ध ने फक दिया, यह मेरा अनुमान हैं ऐसा आपने ही मुझसे कहा है / फेंका गया जो फार्थिव शरीर है वह तो समय पाकर पृथ्वी में धूल- रुप हो जाता है, यह अर्थत: ही ज्ञात हुआ । ऐसी स्थिति में एकमात्र मानिक शरीर से स्िद्धों के लोकें में जाकर वहाँ के निवासी जनों के साथ आपने केसे व्यवहार किया 2 न तो मनोमात्र आत्मा दूसरों के साथ व्यवहार कर स्रकता हैं और न दूसरे ही उसके साथ व्यवहार कर सकते हैं; इस आशय से श्रीरामचन्द्रकी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जब आपका यह भौतिक शरीर पृथ्वी में धूल बन गया, यानी धूलमय हो गया तब आपने किस शरीर से सिद्धलोकों में संचार किया ?