Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अवष्टब्धं प्रवृत्तस्य नान्यावष्टब्धये मम ।
संपद्यते किंचिदपि मनोमननदेहिनः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर जब कोई गिरता तथा नीचे से ऊपर की ओर चढता तो वैसे
मौकों में में झट अपने हाथ आदि का उसे अवलम्बन देने के लिए उद्यत हो जाता था । लेकिन हे
रामजी, उसके सहारे के लिए उद्यत होने पर भी मननशील मनरूपशरीरधारी मेरा हाथ आदि कुछ
भी उसके अवलम्बन के लिए समर्थ नहीं होता था