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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 191

एक सौ नवासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ नन्वेवं सर्ग भूत और भावी सकल सन्देहो का युक्तियोँ से मार्जनकर ज्ञान की ज्ञेयता शान्तिरूप मुक्ति का वर्णन ।

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  1. Verse 1भ्रान्तिरेवेदमखिलं ब्रह्मैवाऽऽभातमेव वा । अर्थात्‌ यह सब ब्रह्म की संसारकूप दुर्दशा भ्रान…
  2. Verse 2यहाँ पर श्रीरामचन्द्रजी जिन शंकाओं का पहले समाधान हो चुका था उनका भी सब के उपकार के लिए प…
  3. Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, शम, दम आदि साधनों से युक्त सम्यक्‌ ज्ञानरूप प्रबोध से भ्रान्त…
  4. Verse 4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, सम्यक्‌ ज्ञानमय कैवल्यरूप बोध क्या कहलाता है ? जिस बो…
  5. Verse 5श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अधिष्ठानभूत चिन्मात्ररूप ज्ञान की ज्ञेयता तीन…
  6. Verse 6श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, चिदेकरस आत्मा के अन्दर उससे भिन्न ज्ञेयता कोन है यह म…
  7. Verses 7–8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्र 'ज्ञप्तिज्ञनिम्‌' यों भाव में व्युत्पन्न ज्ञान केव…
  8. Verse 9श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, बाहरी पदार्थो की भ्रान्ति से यहाँ पर भ्रमबुद्धि उदित हुई…
  9. Verse 10श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, जो यह प्रत्यक्ष दृश्य त्वम्‌, अहम्‌ आदि भूतादि अर्थ…
  10. Verse 11श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप, आदि सृष्टि मेँ ही विराट्‌ आदिरूप कोई पदार्थ उत्पन्न नही…
  11. Verse 12श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, भूत, भविष्यत्‌ ओर वर्तमान काल में स्थित यह जगत्‌दृष्ट…
  12. Verse 13श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, स्वप्न पदार्थ, मृगतृष्णा जल, द्विचन्द्र तथा संकल्पित पदार्थो…
  13. Verse 14श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌ ! अहम्‌, त्वम्‌, अयम्‌ इत्यादि पूर्णरूप से अनुभूयमान जगज्…
  14. Verse 15श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, कारण से कार्य की उत्पत्ति होती है अन्यथा वह उत्पन्न नहीं होता…
  15. Verse 16श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, महाप्रलय होने पर जो जन्म-नाशविहीन परमतत्त्व अवशिष्ट र…
  16. Verse 17श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, कारण में जो कार्य है वह उससे उत्पन्न होता है किन्तु कारण में…
  17. Verse 18श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, महाप्रलय होने पर जगत्‌ सूक्ष्मरूप से ब्रह्म में…
  18. Verse 19वसिष्ठजी ने कहा : हे अनघ, महाप्रलय पर्यन्त उस ब्रह्म में स्थित इस सर्ग की सत्ता का कौन अन…
  19. Verse 20श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : उस ब्रह्म में स्थित ज्ञप्तिरूपा सत्ता का तो ज्ञानियों से अनुभव ह…
  20. Verse 21वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबाहो, यदि इस प्रकार चिद्रूप ही जगत्‌ की सत्ता मानोगो तो ज्ञप्ति (…
  21. Verse 22श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, यदि सृष्टि उस ब्रह्म मे स्थित नहीं है तो यह भ्रान्ति…
  22. Verse 23वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, कार्यकारणता का अभाव होने से ब्रह्म मे न तो भाव (उत्पत्ति)…
  23. Verse 24श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌ यह असमंजस है, यन्त्र के सदृश इस अचेतन (कार्यकारणसंघात…
  24. Verse 25वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, द्रष्टा दृश्यत्व को नहीं प्राप्त होता क्योकि दृश्य का सर्…
  25. Verse 26श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, सृष्टि के आदि में अचेतित जगत्‌ के भान की सिद्धि नहीं है…
  26. Verse 27श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, कारण का अस्तित्व न होने के कारण चेत्य का तनिक…
  27. Verse 28श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : गुरुवर, यदि चेतन की नित्यमुक्तता है तो यह अहन्ता आदि चेत्य कहाँ…
  28. Verse 29श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, कारण का संभव न होने के कारण सृष्टि के आदि में कुछ उत्पन्न ही…
  29. Verse 30श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, वचनो के अगोचर, चेत्य ओर चलनादि क्रियाशून्य सदा स्वप्र…
  30. Verse 31श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, कारण का अभाव होने से सृष्टिरूप विशिष्ट भ्रम का अस्तित…
  31. Verse 32यों वस्निष्ठजी द्वारा निरुत्तर किये गये श्रीरामचन्द्रजी प्रबोध की दढता के अभाव से पूर्णरू…
  32. Verse 33श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, निरुत्तर करने के कारण केवल अप्रतिभा से प्रश्न क…
  33. Verse 34श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, कारण का अस्तित्व न होने से पहले सृष्टि के आदि में ही सृष…
  34. Verses 35–36श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, कारण का अस्तित्व न होने से तथा सर्वत्र शान्त ब्रह्म की सत्ता…
  35. Verse 37श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, यथार्थतः कोई भ्रान्ति नहीं हे । यद्यपि अनन्त (असीम परमब्रह्म)…
  36. Verse 38श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आप सरीखे जीवन्मुक्त पुरुषों के इस सकलजगद्‌भ्रम के शान्त…
  37. Verse 39श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, हमारे सदृश जीवन्मुक्त लोगों के उपदेश आदि सकल व्यवहाररूप से ब्…
  38. Verse 40श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, देश, काल, क्रिया और द्रव्य का भेदज्ञान रखनेवाले अज्ञा…
  39. Verse 41श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जीवन्मुक्ति के पूर्व देश, काल, क्रिया और द्रव्य के भेदज्ञानी…
  40. Verses 42–43श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, तत्त्वदृष्टि से कारण के अभाव में द्वैत और एेक्य का…
  41. Verse 44श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, "जीवन्मुक्त हम लोगों में नहीं” यह कह रहे आपने जीवन्मुक्त…
  42. Verse 45श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, एकमात्र बोधस्वरूप हम लोगों की स्वरूपभूत जो बोधता है वही वायु…
  43. Verse 46श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, यदि ऐसी बात है तो जैसे शान्त सागर में तरंग आदि अपना आकार धारण…
  44. Verse 47श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, यदि ऐसी स्थिति ही तत्त्व है तो 'द्वैतैक्यासंभवे ब्रह्मन्‌ कार…
  45. Verse 48श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, तब शुद्ध अद्वैतपक्ष में पवन के स्पन्द की तरह अहन्ता विकल…
  46. Verse 49श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ज्ञेय अर्थ में सत्यताका आग्रह होने पर पुनः बन्धन की प्रसक्ति…
  47. Verse 50श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, ज्ञप्ति सर्वार्थरूपा नहीं है,क्योंकि जैसे प्रकाशक दीप…
  48. Verse 51श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, कारणरहित बाह्यार्थरूप कार्य की जो यह सत्यता है वह केवल भ्रान्…
  49. Verse 52श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जब तक रहता है तब तक अर्थक्रियाकारी होने से स्वप्न सत्…
  50. Verse 53श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जैसा स्वप्न हे, वैसी ही जगद्‌-स्थित…
  51. Verse 54श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, संसार को स्वप्नवत्‌ एकमात्र मिथ्या मानने से आनन्दावाप्ति…
  52. Verses 55–57श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, अध्यात्मशार्त्र के पूर्वापर के विचार से ज्ञानोदय होने…
  53. Verse 58श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : गुरुवर, तदुपरान्त वासनाओं के सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने पर स्वप्नतुल…
  54. Verses 59–60श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्र, जो जगत्‌ को संकल्परूप जानता है उस जीवन्मुक्त…
  55. Verse 61श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स रघुवर,केवल भ्रममात्रस्वरूप यह दुश्यचक्र (संसारचक्र) यथार्थ तत्…
  56. Verses 62–63श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, इस संसारचक्र के क्रमशः पिंडग्रहविहीन (स्थूलाकारशून्…
  57. Verse 64श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, बालक के संकल्पभूत अतितुच्छरूप से स्थित देदीप्यमा…
  58. Verse 65अविचार से तुच्छता का ज्ञान न होने के कारण ही बालक को भी दुःख होता है, किन्तु विचार द्वारा…
  59. Verse 66श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, चित्त कैसा है ? कैसे उसका विचार किया जाता है ? उक्त चित्…
  60. Verse 67श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, चित्‌ का जो विषयों की ओर झुकना है वही चित्त कहलाता है। इस समय…
  61. Verse 68श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, चित्त के स्थितिकाल में चित्त के निरोध से होनेवाली चित्‌क…
  62. Verse 69श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, चेत्य का जब संभव ही नहीं है तब चिति कैसे ओर क…
  63. Verse 70श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जिस चेत्य का (दृश्यका) सबको अनुभव होता है, उसका केसे संभ…
  64. Verse 71श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुवर, अज्ञानियों का दृष्टिगोचर जैसा जगत्‌ है वह सत्य नहीं हे, ज…
  65. Verses 72–73श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, अज्ञानियों की त्रिलोकी कैसी है और वह सत्य कैसे नहीं है ओ…
  66. Verse 74श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जो जगत्‌ सृष्टि के आदि में उत्पन्न नहीं हुआ ओर जिसका कभी…
  67. Verse 75श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जाग्रत्‌ जगत्‌ स्वप्न जगत्‌ के समान असत्‌ होता हुआ भी सतूसा प…
  68. Verse 76श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, स्वप्न आदि में ओर मनोरथ, वितर्कं आदि में जो दृश्य का अनु…
  69. Verse 77श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, संस्कार से स्वप्न में क्या जाग्रत्‌ में प्रसिद्ध अर्थ का ही अ…
  70. Verse 78श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, स्वप्न और मनोराज्य आदि कल्पनाओं में संस्काररूप से जाग्रत…
  71. Verse 79श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुनाथ, जाग्रत्‌ के संस्कार से जाग्रत्प्रसिद्ध अर्थ का ही स्वप्न…
  72. Verse 80श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जाग्रत्‌पदार्थ का स्वप्न में भान नहीं होता, किन्तु अन्य…
  73. Verse 81श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, सब कुछ अपूर्व सा भासित होता है ऐसा ही नियम नहीं है, किन्…
  74. Verse 82श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, इस प्रकार से आपसे बोधित हुआ मैं जाग्रत्‌ जगत्‌ भी स्वप्न…
  75. Verses 83–84उसके कारण की विवेचना द्वारा उसकी चिकित्सा करनी चाहिये इस आशय से श्रीवसिष्ठजी स्वप्न संसार…
  76. Verse 85हे महामते श्रीरामजी, चेत्य के उन्मुख चित्‌ ही चित्त है यह बात मैं पीछे अनेक बार कह चुका ह…
  77. Verse 86जब चित्‌ जगत्‌ है और विषयाभिमुख चित्‌ ही चित्त है तब जैसा शाखा प्रशाखारूप अवयव और वृक्षरू…
  78. Verse 87श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी कल्पना कदापि नहीं हो सकती, क्योकि यदि विच…
  79. Verse 88श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आपके सदुपदेश से मैं यह मानता हूँ कि भ्रान्ति से द्रष्ट्र…
  80. Verse 89इस प्रकार जगत्‌ केवल भ्रान्ति ही है, यों निश्चय कर चुके श्रीरामचन्द्रजी के प्रति जगत्‌ सा…