Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 59–60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verses 59–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 59,60
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्र, जो जगत् को संकल्परूप जानता है उस जीवन्मुक्त
पुरुष की वह अतिसूक्ष्म वासना भी उत्तरोत्तर भूमिकाओं के परिपाक क्रम से विलीन हो जाती है। इससे
वासनाविहीन हुआ वह शीघ्र निर्वाण पद को प्राप्त होता है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, अनेक जन्म जन्मान्तरों से बद्धमूल, शाखा-प्रशाखाओं से युक्त,
जन्म-मरणरूपी बन्धन मेँ डालनेवाली भीषण वासना कैसे शीघ्र शान्त हो जाती हे ?