Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एवं चेत्तन्मुनिश्रेष्ठ परमार्थमयं जगत् ।
सर्वदा सर्वभावात्मा नोदेति न च शाम्यति ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
भ्रान्तिरेवेदमखिलं ब्रह्मैवाऽऽभातमेव वा । अर्थात् यह सब ब्रह्म की संसारकूप दुर्दशा भ्रान्ति ही है
अथवा ब्रह्म ही कोतुकवश जीव और जगत् के आकार से स्फुरित हुआ है । यों अन्तर्मे जो बन्ध ओर
मोक्ष का निष्कर्ष प्रदर्शन किया उसका परिष्कार कर कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, ज्ञान की ज्ञेयतापत्ति बन्ध कहलाता है और ज्ञान ही
ज्ञेयता-शान्ति मोक्ष कहलाता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ नवासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ नन्वेवं सर्ग भूत और भावी सकल सन्देहो का युक्तियोँ से मार्जनकर ज्ञान की ज्ञेयता शान्तिरूप मुक्ति का वर्णन ।