Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 83–84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verses 83–84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 83,84
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उसके कारण की विवेचना द्वारा उसकी चिकित्सा करनी चाहिये इस आशय से श्रीवसिष्ठजी स्वप्न
संसार का कारण पूछते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जो यह संसाररूपी स्वप्न है इसका कारण क्या है ?
कार्य से कारण भिन्न नहीं होता यह बात शतशः देखी गई हे, इसीका आप विचार कीजिये। चूँकि कारण
चित्त ही है, अतएव स्वप्नज्ञान चित्तरूपी ही हैं वैसे ही आद्यन्त विहीन असार निर्विकार विश्व भी चित्त
ही है