Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 55–57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verses 55–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 55-57
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, अध्यात्मशार्त्र के पूर्वापर के विचार से ज्ञानोदय होने पर
पदार्थो मे साकारता की निवृत्ति होती है ओर इसी प्रकार स्वप्न के पदार्थों में जाग्रत् होने पर स्थूल
भावना निवृत्त हो जाती है।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : जिसकी अध्यात्मशार्त्र के पूर्वापर के पर्यालोचन से जगत्स्थूलता की
भावना सूक्ष्मता को प्राप्त हो चुकी वह जीवन्मुक्त पुरुष जगत् को कैसा देखता है ओर उसकी यह
संसारगर्तरूपी भ्रान्ति कैसे मिटती है ?
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, वासनाविहीन जीवन्मुक्त पुरुष जगत् को उजड़ा हुआ,
असत् के सदुश, गन्धर्वनगरतुल्य ओर वृष्टि से मिटाये गये चित्र के तुल्य देखता हे