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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 86

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 86

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जब चित्‌ जगत्‌ है और विषयाभिमुख चित्‌ ही चित्त है तब जैसा शाखा प्रशाखारूप अवयव और वृक्षरूप अवयवी का भेदसहिष्णु अभेद है इसी प्रकार भेदाभेद से ब्रह्म मे जगत्‌ स्थित है ऐसा ही क्यो नहीं कहते हैं, स्वप्न आदि कुछ नहीं है यों निषेध क्यो करते हैं ? ऐसी श्रीरामजी शंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जैसे शाखादि अवयवों और वृक्षरूप अवयवी का तादात्म्यरूप एकता (अभेद) भेदसहिष्णु है वैसे ही चित्त और जगत्‌ का भी तादात्म्यरूप अभेद भेद सहिष्णु हो। उस स्थिति में समष्टिचित्तरूप जगत्‌ आदि से अवयवरहित ब्रह्म में एकता हो