Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 37
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, यथार्थतः कोई भ्रान्ति नहीं हे । यद्यपि अनन्त (असीम परमब्रह्म)
निज माया से अनन्त भासता है उसी में सम्पूर्ण अक्षत महाचिद्घन अभ्यासभ्रान्ति है । भाव यह कि जैसे
जीवन्मुक्त पुरुषों की चिद्घनस्वरूप सकल वस्तुओं में व्यवहार -प्रवृत्ति होती है वैसे ही आपकी भी
उनसे अभ्यास प्रवृत्ति हो, इसमें क्या क्षति है २