Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 7, 8
संस्कृत श्लोक
तस्माद्द्रष्टास्ति नो दृश्यं नैवास्तीदमनामयम् ।
चित्प्रभैवात्मना भित्तिर्भवत्याभासनं तथा ॥ ७ ॥
द्रष्टृदृश्यात्मिकैकैव स्वात्मनैव विराजते ।
स्वप्नादिषु यथेहाद्य द्रष्टृदृश्यात्मिका सती ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्र 'ज्ञप्तिज्ञनिम्' यों भाव में व्युत्पन्न ज्ञान केवल बोधमात्ररूप
है । पवन ओर स्पन्द के समान ज्ञान ओर ज्ञेय का भेद नहीं हे । श्रीवसिष्ठजी के उत्तर का भाव यह है कि
भाव अर्थ में ही ज्ञान शब्द की व्युत्पत्ति करनी चाहिये ज्ञेय जगद्रूपता ज्ञान का ही मायिक भेद है वह ज्ञान
की एकरसता का विघातक नहीं हे ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे गुरुवर, यदि ऐसी बात है तो ज्ञान, ज्ञेय आदि भ्रम कैसे सिद्ध हुआ ? वह
ज्ञान का ज्ञेय जगद्रूपताभूत विकल्प खरगोश के सींगों की तरह ह । वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से भूत,
वर्तमान ओर भविष्यत् विभागों से व्यवहार योग्य कैसे मालूम होता है ?