Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 48
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, तब शुद्ध अद्वैतपक्ष में पवन के स्पन्द की तरह अहन्ता विकल्प की
कल्पनाकर कौन व्यवहार का भोग करता है अथवा भोक्ता ही कौन है जिसके कारण यह अनन्त
जगद्आान्ति का उल्लास होता है । जगद्भ्रान्ति विकल्प का भी वैसे निषेध न होने पर फिर बन्धन और
मोक्ष की कल्पना भी होगी ? यह श्रीरामजी के प्रश्न का आशय हे