Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 24
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन् यह असमंजस है, यन्त्र के सदृश इस अचेतन (कार्यकारणसंघात
देहेन्द्रियादि) रूपता को वह चेतिता (चेतना करनेवाला चलानेवाला कैसे) प्राप्त कर सकता हे ?
चैतन्यरूप सर्वद्रष्टा अचेतन (जड) दुश्यता को कैसे प्राप्त हो सकता है ? भला काष्ठ जो दाह्य
(जलनेवाला) है वह दग्धा (जलानेवाला) होकर अग्नि को दाह्य बनाकर कब ओर कैसे जला सकता
है?