Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 72–73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verses 72–73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 72,73
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, अज्ञानियों की त्रिलोकी कैसी है और वह सत्य कैसे नहीं है ओर
ज्ञानियों का जैसा जगत् है वह वाणी का विषय केसे नहीं हो सकता है ?
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, अज्ञानियों का जो जगत् है वह देश, काल, ओर वस्तुकृत परिच्छेद से
युक्त है किन्तु उस तरह का यानी देशकृत, कालकृत और वस्तुकृत परिच्छेदवाला जगत् ज्ञानियों की
दृष्टि में इस समय है ओर न सृष्टि के आदि मेँ ही उसका संभव है, अतएव ज्ञानियों की दृष्टि में
वन्ध्यापुत्र के समान मिथ्या है