Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 87
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 87
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, ऐसी कल्पना कदापि नहीं हो सकती, क्योकि यदि
विचार-विमर्श किया जाय तो सृष्टि के आरम्भ में जगत् कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं, इसलिए भासित हो
रहा यह सब प्रपंच अजर, शान्त, अजन्मा, अखण्ड परमात्मरूप ही है