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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 42–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 42,43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, तत्त्वदृष्टि से कारण के अभाव में द्वैत और एेक्य का संभव न होने पर बोध्यबोधकता का अभाव होने से बोधता (ज्ञान) कैसे हो सकती है ? जिसका बोध हो वह कर्म अवश्य होना चाहिये। लोक में अकर्मक बोधशब्द प्रसिद्ध नहीं हे । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, अज्ञात ब्रह्म बोध से अपने अज्ञानविनाशरूप फल का आश्रय होने से बोधता को (बोधकर्मताको) प्राप्त होता है उसी से बोध शब्द भी बोध्यता को (बोधफलवत्तारूप सकर्मकता को) प्राप्त होता है। यह सब अज्ञानवान्‌ जो आप लोग हैं आप लोगों के विषय में ही लागू होता है जीवन्मुक्त हम लोगों में अज्ञान न रहने के कारण बोध की सकर्मकता का निरूपण नहीं किया जा सकता, यह भाव है