Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 89
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 89 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 89
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जगत् केवल भ्रान्ति ही है, यों निश्चय कर चुके श्रीरामचन्द्रजी के प्रति जगत् सादि
(प्रारंभवाला) है इस भ्रातिमय दृष्टि का यौक्तिकद्ठष्टि और तत्त्वद्ृष्टियूलक शास्त्रीयविचार से मैं
निराकरण कर चुका हूँ, यों श्रीवसिष्ठजी सर्ग का उपसंहार करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, लोक में तीन प्रकार की दृष्टियाँ प्रसिद्ध हैं - १. पामर दृष्टि, २.
योक्तिक दृष्टि और ३. तत्त्वदृष्टि | उनमें से प्रथम दृष्टि का दूसरी ओर तीसरी दो दुष्टियों से खंडन
करना चाहिये ओर अन्त में दूसरी दृष्टि का तीसरी यानी तत्त्वदृष्टि से खण्डन करना चाहिये । इस
अभिप्राय से पिछली दो दृष्टयो का अवलम्बन कर मैंने इस समग्र विश्व का यथार्थरूप से अवलोकन
किया है। दो दृष्टियोंमें सार में से भी निर्मथन करके मुख्य सारभूत पदार्थ का ग्रहण करने में समर्थ तथा
प्रमाण ओर प्रमेय तत्त्व की परीक्षा करने में कुशल विद्वानों की दृढ़तर विचार करनेवाली अति निष्कर्षभूत
होने से अभिनव (नवीन) जो लोकोत्तर दृष्टि है वह पहली है और अध्यात्मशास्त्र के श्रवण, मनन,
निदिध्यासन आदि के परिपाक से सिद्ध परमतत्त्वरूप अर्थ मात्र का अपरोक्षरूप से जिसमें स्फुरण होता
है ऐसे जीवन्मुक्त पुरुषों में पाई जानेवाली दृष्टि दूसरी है । उक्त दो दृष्टयो का अवलम्बन करके इस
शास्त्र में मैंने तब तक निरीक्षण किया है जव तककि सकल दृष्टियाँ, द्रष्टा, जीव तीनों कालों में नहीं
रहे, जगत् की शून्यता का भी ग्रहण नहीं हुआ ओर भ्रम का ज्ञान भी नहीं हुआ एवं जब तक नित्य
अपरोक्ष परमानन्दरूप ब्रह्मात्मैक्यवस्तु स्थित नहीं हुई