Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्थंरूपमिदं भाति चितिरूपप्रभाप्रभा ।
पश्य सैवात्मनाऽऽस्ते यत्प्रकाशादिभिरेव च ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अधिष्ठानभूत चिन्मात्ररूप ज्ञान की ज्ञेयता तीनों
कालों में भी नहीं है । अव्यय केवल ज्ञान अवाच्य है, इसलिए सर्वदुश्यवाधपर्यन्त ही तत्त्वसाक्षात्कार
कहा गया हे । आपात ज्ञान वैसा नहीं हे