Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 69
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 69
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, चेत्य का जब संभव ही नहीं है तब चिति कैसे ओर
कहाँ से चेत्य की कल्पना करती है । इस कारण चेत्य के अंसभव से चित्तसत्ता नितरां नहीं हे । चेत्य के
असंभव के दर्शन से चेत्य का परिमार्जन ही चित्तनाश का उत्तम उपाय है, यह श्रीवसिष्ठजी के उत्तर का
आशय है