Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 54
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, संसार को स्वप्नवत् एकमात्र मिथ्या मानने से आनन्दावाप्तिरूप
अभीष्ट कैसे सिद्ध होता है ? केवल मिथ्या ज्ञान से स्वप्न आदि में पदार्थ की पिण्डरूपता (साकारता)
कैसे शान्त होती है ?