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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 75

तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त चौहत्तरवाँ सर्ग प्रमाद से संसार-भ्रान्ति, प्रबोध से सदा पूर्णता तथा जीवन्मुक्त के गुणों का वर्णन ।

85 verse-groups

  1. Verse 1ये मूढ़ लोग अविचार से ही रोते है", यह जो पहले कहा था, उसी का आरम्भ में सविस्तार विचार करत…
  2. Verse 2जैसे मदिरा के स्वाद से मद की महाशक्ति प्राप्त होती हे, वैसे ही अहन्ताध्यास से जीव स्थूल औ…
  3. Verse 3जैसे मरुभूमि में सूर्य किरणों के ताप से जल प्रतीत हो जाता है, वैसे ही उक्त स्वरूपवाली इस…
  4. Verse 4मन, बुद्धि, अहंकार, वासना ओर इन्द्रिय इस प्रकार के नाम ओर रूप की कल्पना करनेवाले स्वस्वरू…
  5. Verse 5अवस्थित है, ऐसा कहते है । हे श्रीरामजी, चित्त ओर अहंकार यों दो प्रकार का व्यवहार केवल वाण…
  6. Verse 6जैसे बर्फ से भिन्न शुक्लत्व की कल्पना की जाती है, पर वास्तव में बर्फ और शुक्लत्व में परस्…
  7. Verse 7चित्त और अहंकार की एकता की उक्ति का फल कहते है । भद्र श्रीरामचन्द्रजी, जैसे पट का विनाश ह…
  8. Verse 8अब उसके उच्छेदन का उपाय कहते हैँ । भुझे मोक्ष मिले इस प्रकार की तुच्छ मोक्षेच्छा, सांसारि…
  9. Verse 9मोक्षेच्छा का त्याग क्यो करना चाहिए, इस पर कहते है । हे रामभद्र “मुञ्चे मोक्ष मिले" इस प्…
  10. Verse 10मन का परिच्छिन्न शरीर के आकार में परिणत होना ही दोष है, न कि शुद्ध आत्मा के आकार में परिण…
  11. Verse 11प्राण आदि वायुओं से होनेवाले चलन आदि धर्मो से युक्त देह इत्यादि से आत्मा विलक्षण है यह बत…
  12. Verse 12जैसे वायु वृक्ष में पललवों की पंक्ति को चलाता है, वैसे ही प्राणादि वायु देह में अंगों की…
  13. Verse 13सब पदार्थों को व्याप्त कर लेनेवाली अतिसूक्ष्म चिति न तो स्वतः चल है और न किसी से चलायमान…
  14. Verse 14शुद्ध आत्मभाव में आत्मा का संचलन नहीं होता तो भले ही न हो, पर सर्वात्मरूपता के भाव में तो…
  15. Verse 15आत्मा और देह की तनिक भी समानता नहीं है, यह जब वस्तु स्थिति है, तब दुर्बुद्धियों को "यह दे…
  16. Verse 16आत्मा और शरीर का अत्यन्त वैधर्म्य होने पर भी देह में ज्ञातृत्व ओर आत्मा में कर्तृत्व, भोक…
  17. Verse 17उपलब्धि के अनुसार ही उत्तरोत्तर भ्रान्ति की बीजभरूत वासना भी बढ़ती जाती है यों कहते हैं।…
  18. Verse 18असलियत में असत्य ही है, तथापि असत्यत्वरूप से अज्ञात अतएव सत्य-सी दीखाई पडनेवाली यह अज्ञता…
  19. Verse 19हे रामजी, जैसे जिसका स्वरूप जान लिया गया हो, ऐसी चाण्डाल-कन्या ब्राह्मणों की पंक्ति में स…
  20. Verse 20हे रामभद्र, जैसे “यह मृगजल है” इस प्रकार तात्विक स्वरूप से जाना गया मृगजल प्यासे मृग को अ…
  21. Verse 21श्रीरामजी, जैसे दीपक से अन्धकार नष्ट हो जाता है ओर प्रकाश आ जाता हे, वैसे ही परमार्थरूप आ…
  22. Verse 22जैसे ताप से तुषार कणिका गल जाती है, वैसे ही “अविद्या का अस्तित्व किसी तरह नहीं है", इस प्…
  23. Verse 23इस जड देह के लिए भोगों से क्या प्रयोजन है ? इस प्रकार के निश्चय से युक्त तत्त्वज्ञ पुरुष…
  24. Verse 24हे श्रीरामजी, अपने हृदय से इच्छाओं के परिवारभूत देहाभिमान आदि का निश्चितरूप से परिहार हो…
  25. Verse 25हे मर्यादापुरुषोत्तम, जैसे वृष्टि से धोया गया पर्वत परम शीतलता को प्राप्त करता हैं, वैसे…
  26. Verse 26जैसे शरद्काल मेँ निर्मलत्व आदि शोभा से आकाशतल अत्यन्त सुशोभित होता है, वैसे ही वह तत्त्वज…
  27. Verse 27जैसे मेघ वर्षाकाल में बरस चुकने के कारण शरत्‌काल में गर्जन आदि से शून्य हो जाता है, वैसे…
  28. Verse 28हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे अचल मेरु स्थिरता और धीरता को ग्रहण करता है, वैसे ही अचल तत्त्ववे…
  29. Verse 29तत्त्ववेत्ता मुनि अपने ही स्वरूप में ऐसे उत्तम शान्ति से समन्वित रहता है, जैसे वायुरहित प…
  30. Verse 30जैसे मध्यदीपवाला घट, मध्यज्वालावाला अग्नि ओर प्रस्फुरित कान्तिवाला मणि अपने भीतर प्रकाश क…
  31. Verse 31तत्त्ववित्‌ महानुभाव सब भूतों के आत्मस्वरूप, सर्वत्र सत्तावाले, सबके नियन्ता, सबके नायक,…
  32. Verses 32–33आत्मतत्त्व स्वरूप को पहचान लेनेवाला महात्मा भूतपूर्व उन तुच्छ दिवसों की पंक्तियों का स्मर…
  33. Verse 34तत्त्ववेत्तापुरुष विषयी पुरुषों के संग और विषयों के अनुरंजन से वर्जित, मान और मानसिक चिन्…
  34. Verses 35–36तत्त्वज्ञ विद्वान्‌ सबसे उत्तम सार्वभौम शान्ति को, साधारण जीवों के लिए अत्यन्त दुर्लभ परम…
  35. Verse 37तत्त्वज्ञ न तो कुछ देता है, न किसी का ग्रहण करता है, न किसी की स्तुति करता है, न किसी की…
  36. Verse 38समस्त आरम्भों का (लौकिक, वैदिक कर्मो का) परित्याग करनेवाला, समस्त उपाधियों से वर्जित तथा…
  37. Verse 39महाराज वसिष्ठ श्रीरामभद्र को जीवन्मुक्त के लक्षणों की शिक्षा देते हैं। हे श्रीरामजी, जैसे…
  38. Verse 40अभिलाषा के परित्याग की प्रशसा करते हैं । हे श्रीरामभद्र, जिस प्रकार चन्द्र-बिम्ब की नाई अ…
  39. Verse 41हे राघव, जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌ को सुशीतल करनेवाला नैराश्य अन्तरात्मा को सुख पहुँचाता…
  40. Verses 42–43श्रीरामजी, जिस प्रकार नैराश्य से सम हुए अन्तःकरण से युक्त उदारमति मौनी तत्त्वज्ञ सुशोभित…
  41. Verse 44श्रीरामजी, नैराश्य से जैसी शीतलता प्राप्त होती है, वैसी शीतलता न तो हिमालय से, न मोतियों…
  42. Verse 45हे साधो, जिस मोक्षनामक परम सुख के लिए तीनों लोकों की सम्पत्तिर्यो तिनके की नाई कुछ भी उपक…
  43. Verse 46हे रघुकुलकमलदिवाकर, आपत्तिरूपी करंज (करंजुवे) वृक्ष के लिए परशुरूप, परम निरतिशय विश्रान्त…
  44. Verse 47हे श्रीरामजी, नैराश्य से अलंकृत आकृतिवाले महात्मा की दृष्टि में पृथ्वी गाय के खुर की तरह,…
  45. Verse 48भद्र, इस जगत्‌ मे जो लौकिक और शास्त्रीय दान, आदान यानी धन आदि का स्वीकार, समाहार यानी संग…
  46. Verse 49हे श्रीरामचन्द्रजी, आशा जिसके हृदय में अपना स्थान कभी नहीं जमा सकती, ऐसे सम्पूर्ण त्रिभुव…
  47. Verse 50भद्र, 'मुझे यही होना चाहिए ओर यह नहीं होना चाहिए" इस प्रकार की इच्छा जिसके चित्त में नहीं…
  48. Verse 51श्रीरामभद्र, समस्त संकटों के पारभूत, संकट और मल से वर्जित, सुखात्मक तथा बुद्धि की परम सार…
  49. Verse 52हे श्रीरामजी असलियत में आप में (आत्मा में) न तो आशाओं का अस्तित्व हे ओर न आपका (आत्मा का)…
  50. Verse 53आशाओं के आत्यन्तिक निरास के हेतु का अन्वेषण करने पर उसका परिज्ञान न होने के कारण मोह को प…
  51. Verse 54आपका वैसा कहना यद्यपि उचित है, तथापि आशारूपी दुःखकी निवृत्ति किस प्रकार से होगी ? तो इस प…
  52. Verse 55हे राघव, इन पदार्थों के समूहों का जो यथार्थ आत्मभूत स्वरूप है, उसको जानने से ही पुरुष बुद…
  53. Verse 56समस्त पदार्थो का यथार्थ स्वरूप किस प्रकार का है ? इसे कहते हैं। उत्पत्ति, विनाश और विकल्प…
  54. Verse 57श्रीरामजी, जैसे वीर केसरी के पास से हिरनी पलायन कर भाग जाती है, वैसे ही समस्त विकल्पों के…
  55. Verse 58इसी प्रकार काम आदि दोष भी भाग जाते हैं, इस आशय से कहते हैं। जिसकी बुद्धि धीर है, ऐसा तत्त…
  56. Verse 59हे अंग, जैसे वायु पर्वत को न आनन्द दे सकता है, न खेद दे सकता है और न घैर्य से प्रच्युत कर…
  57. Verse 60भद्र जिसके विषय में बाल अंगनाएँ अनुरक्त हैं, ऐसे भी तत्त्वज्ञ मुनि के अन्तःकरण में उदार ब…
  58. Verse 61आत्मा के तत्त्व को पहचान लेनेवाले अपराधीन (इन्द्रियों के अवशीभूत) विद्वान्‌ को राग और द्व…
  59. Verse 62जैसे पथिक मरुभूमि में रमण या विश्राम नहीं करता, वैसे ही विद्वान, जो लता ओर वनिता में एक-स…
  60. Verse 63तब क्या विद्रान्‌ खाना, पीना आदि का परित्याग कर देता है ? तो इस पर कहते हैं । हे श्रीरामज…
  61. Verse 64जो तत्त्वज्ञ गृहस्थ है, वह अपने स्त्री आदि के लिए उपभोग का आस्वाद होने पर भी रागी पुरुष क…
  62. Verse 65जैसे दो वीचियाँ शेलेन्द्र मन्दराचल को क्षोभ नहीं पहुँचा सकती, वैसे ही जिसने प्रत्यक्‌ -दृ…
  63. Verse 66अवहेलना से यानी असत्यत्वबुद्धि से विषयों को देख रहा मृदु, दमनशील तथा समस्त चिन्ता आदि ज्व…
  64. Verses 67–68अनेक भुवनो को उत्पन्न कर रहे अपनी आत्मा में परम विश्रान्ति लेनेवाले हिरण्यगर्भ की ही नाई…
  65. Verse 69जैसे वसन्त आदि ऋतुओं के आने पर पर्वत किसी प्रकार का क्षोभ प्राप्त नहीं करता, वैसे ही काला…
  66. Verse 70भीतरी आसक्ति ही दोष की उत्पादक है, ऊपर ऊपर की बनावटी आसक्ति दोष की उत्पादक नहीं है, इस वि…
  67. Verse 71आन्तर आसक्ति के त्याग से देहदुःख आदि की भी प्रसक्ति नहीं होती, ऐसा कहते हैं। शरीर से पृथक…
  68. Verse 72देह से अतिरिक्त आत्मा का विस्मरण होने पर तो फिर दुःख होगा ? इस आशंका पर कहते हैं। जैसे एक…
  69. Verse 73विस्मरण की अप्राप्ति मे दृष्टान्त ओर उपपत्ति से युक्त हेतु बतलाते हैं। जैसे पर्वत के तट स…
  70. Verse 74निष्कर्ष यह निकला कि आत्म भ्रान्ति की निवृति हो जाने पर आत्मा का विस्मरण फिर नहीं होता ।…
  71. Verse 75हे श्रीरामजी, अपने हृदय की ग्रन्थि का उच्छेद हो जाने पर फिर देहादि के गुणों से आत्मा का ब…
  72. Verse 76पत्थर का छेदन और मणि के तात्त्विक स्वरूप का विचार इन दोनों की सहायता से जो मणि का अंश नही…
  73. Verse 77अविद्या का असली स्वरूप जान लेने के अनन्तर कौन बुद्धिमान्‌ पुरुष फिर उसमें डूबता है यानी फ…
  74. Verse 78जैसे विशुद्ध सलिल मे हुई दुग्घ भ्रान्ति दुग्ध स्वरूप का विचार करने के अनन्तर विनिवृत्त हो…
  75. Verse 79इस लोक में श्रेष्ठ श्रेणी के ब्राह्मण लोग तब तक जलबुद्धि से मद्य पी लेते हैं, जब तक उसका…
  76. Verse 80हे श्रीरामचन्द्रजी, तत्त्ववेत्ता पुरुष रूपलावण्ययुक्त कामिनी को भी चित्र में लिखित कान्ता…
  77. Verse 81हे श्रीरामजी, जैसे चित्र में चित्रित कामिनी के केश, ओष्ठ आदि अवयव मषी, कुंकुम आदि रंगस्वर…
  78. Verse 82यदि शंका हो कि जैसे स्री आदि विषयों का अनुभूयमान जो स्वरूप है, उससे विपरीत ही उनका तात्वि…
  79. Verse 83अतएव जब एक बार अनुभूत पदार्थ को भी अन्यथा नहीं कर सकते, तब केवल उसी एक वस्तु में व्यसनी प…
  80. Verse 84हे श्रीरामजी, इस प्रकार विशुद्ध परब्रह्मतत्त्व में उत्तम विश्रान्ति को प्राप्त हुआ धीर तत…
  81. Verse 85भद्र, भला बतलाइये तो सही कि ऐसा कौन बलिष्ठ स्वामी हे, जिसने परपुरुष के संग में व्यसन रखने…
  82. Verse 86हे राघव, सांसारिक विभिन्न विषयानन्दरूपी जो अनेक पुण्यरस हैं, वे सब जिसमें शहद के छन्ते की…
  83. Verses 87–89प्रकार संकल्प कान्त से आनन्दविभोर होती है और दुःखों से पीडित नहीं होती, उसी प्रकार जिस मह…
  84. Verse 90उसमें भी जो तत्त्वज्ञ सप्तम भूमिका में आरूढ़ है, उसकी अत्यन्त स्थिरता रहती है, ऐसा कहते ह…
  85. Verse 91हे राघव, मन के विनाशपर्यन्त भूमिका में सुप्रतिष्ठित पुरुष धीर तत्त्वज्ञ यद्यपि पूर्वकालिक…