Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
विधिर्दैवं विधिर्धाता सर्वेशः शिव ईश्वरः ।
इति नामभिरात्मा नः प्रत्यक्चेतन उच्यते ॥ ३५ ॥
अस्त्यवस्तुनि वस्त्वन्तः काञ्चनं सिकतास्विव ।
अस्ति वस्तुन्यवस्त्वन्तर्मलं हेमकणेष्विव ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ विद्वान् सबसे उत्तम सार्वभौम शान्ति को, साधारण जीवों के लिए अत्यन्त
दुर्लभ परमपद को तथा संसारताप में पुन: पुनः सन्ताप-स्वरूप आवृत्ति से वर्जित यानी अनावृत्तिपद
स्वरूप साम्राज्य को प्राप्त हुआ रहता हे । समस्त लोगों के द्वारा कर्म और वाणी से उस महाविद्वान् का
सुन्दर परम पावन चरित्र चाहा जाता है, पर वह कुछ भी नहीं चाहता | सभी मनुष्य उसके चरित्र फलों का
अनुमोदन करते हैं, पर वह किसी का अनुमोदन नहीं करता यानी उदासीन रहता हे