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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

शम्बरैकपरोऽप्यन्तःशम्बरैकतयोदितः । संसारशम्बरं राम शम्बरस्त्यक्तवानिदम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

मोक्षेच्छा का त्याग क्यो करना चाहिए, इस पर कहते है । हे रामभद्र “मुञ्चे मोक्ष मिले" इस प्रकार की यदि भीतर इच्छा उत्पन्न हो गई, तो मन सबल हो गया, यह जान लेना चाहिए । मनन की ओर मन के एक दम उत्कण्ठित हो जाने पर वही मन शरीर के आकार में परिणत हो जाता है और फिर बहिर्मुखता का सम्पादन कराकर केवल दोष को ही उत्पन्न करता हे । अतः किसी पदार्थ की इच्छा करनी ही नहीं चाहिए । चाहे वह पदार्थ मोक्ष हो, चाहे सांसारिक वस्तु हो । पदार्थ की इच्छा ही तुच्छ है