Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
केचिद्व्योमनि तिष्ठन्ति धिष्ण्यचक्रान्तरस्थिताः ।
यथा बृहस्पत्युशनश्चन्द्रसूर्यमुनीश्वराः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्ववेत्ता मुनि अपने ही स्वरूप में ऐसे उत्तम शान्ति से समन्वित रहता है,
जैसे वायुरहित प्रदेश में दीपक अपने स्वरूप में शान्त रहता है। और परम तृप्ति को ऐसे प्राप्त करता है,
जैसे अमृत पी जानेवाला पुरुष परम तृप्ति को प्राप्त करता है