Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
असक्तबुद्धिर्हरिणा कुर्वन्दानवसंगरम् ।
परां संविदमासाद्य कुशलस्त्यक्तवानिदम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मन का परिच्छिन्न शरीर के आकार में परिणत होना ही दोष है, न कि शुद्ध आत्मा के आकार में
परिणत होना दोष है, इस आशय से कहते है ।
सम्पूर्ण परिच्छन्न वस्तुओं से परे अथवा समस्त भूतगणो में व्याप्त आत्मा में क्या बंध है और क्या
मोक्ष है इसलिए हे श्रीरामजी, आप परिच्छिन्नता-मनन का ही निर्मूलन कर दीजिए