Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अयुक्ते युक्तता युक्त्या प्रेक्ष्यमाणा प्रदृश्यते ।
पापस्य हि भयाल्लोको राम धर्मे प्रवर्तते ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ न तो कुछ देता है, न किसी का ग्रहण करता है, न किसी की स्तुति करता है, न किसी की
निन्दा करता है, न अपने स्वरूप के तिरोधान को प्राप्त होता है, न उदय को प्राप्त होता है यानी फिर
स्वरूप के आविर्भाव को प्राप्त नहीं होता, न सन्तुष्ट होता है और न शोक करता है