Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
नीरागा निरुपासङ्गा जीवन्मुक्ता महाधियः ।
संभवन्तीह बहुशः सुहोत्रजनका इव ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, नैराश्य से अलंकृत आकृतिवाले महात्मा की दृष्टि में पृथ्वी गाय के खुर की तरह,
सुमेरु पर्वत स्थाणु की तरह (काटे गये वृक्ष के अवशिष्ट भाग की तरह), दिशाएँ साधारण पिटारियो की
तरह ओर सारा त्रिभुवन तृण की तरह प्रतीत होता है