Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
यो जीवति गतस्नेहः स जीवन्मुक्त उच्यते ।
सस्नेहजीवितो बद्धो मुक्त एव तृतीयकः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी असलियत में आप में (आत्मा में) न तो आशाओं का अस्तित्व हे ओर न आपका
(आत्मा का) आशाओं से किसी तरह का सम्बन्ध ही है । इस जगत् को अज्ञानवश से उत्थित मिथ्या
भ्रममात्र उस प्रकार जानिये, जिस प्रकार दौड रहे रथ के ऊपर अवस्थित पुरुष को दोनों ओर बगल की
दिशाओं में विद्यमान तरु, गुल्म आदि में पहियों के परिभ्रमण से भ्रमवश परिभ्रमण होता दिखाई पडता
है। अथवा हे श्रीरामजी, आप आशाओं का अवलम्बन मत कीजिये । आशाएँ एक तरह की चोर हैं,
क्योंकि आत्मा ओर अनात्मा के विवेक विज्ञानरूपी धनसम्पत्ति का अपहरण कर वे पुरुषों को आत्मसुख
से वंचित कर देती हैं । जगत् का वैषयिकसुख मूढ पुरुषों से ही सैकड़ों तरह की अभिलाषाओं के द्वारा
चाहा जाता है । जैसे दौड़ रहे रथ में लगे हुए पहियों के ऊर्ध्व और नीचे प्रदेश में होनेवाला घुमाव नेमी
का आश्रय करनेवाले पिपीलिका इत्यादि जीवों के पतन, पेषण (कुचला जाना) आदि अनर्थ का कारण
होता है, वैसे ही मिथ्या भ्रममात्र जगत् भी उसका आश्रय करनेवाले यानी भ्रान्तिरूप जगत् में सत्यत्वमति
रखनेवाले जीवों के जन्म, मरण आदि अनर्थो का कारण है यानी अनर्थो के लिए ही जगत् समुत्थित है,
यह जानिए।
अथवा उत्तम सुख की अभिलाषा से निम्न कोटी के चुखो की अभिलाषा का अपहरण करने के लिए
उत्तरोत्तर अन्य अन्य आशाओं का परिग्रह करना पडेगा, ऐसी स्थिति में आशाओं की अभिवृद्धि ही
होगी, आशा का विनाश नहीं होगा, इस प्रकार की श्रीरामचन्द्रजी की आशंका को ताडकर महाराज
वस्निष्ठजी कहते हैं।
हे श्रीरामजी, उत्कृष्ट आशा निकृष्ट आशाओं की अपह््री हैं, इस अभिप्राय से नैराश्य का कथन
मैंने नहीं किया है, ऐसा आप जानिये, क्योकि जगत् तो मिथ्या भ्रम है, यानी मिथ्याभूत वस्तुओं में
अभिलाषाओं की परम्परा का उत्पादन कर वह पुरुषों को चक्कर में डालता है। और जैसे दौड़ रहे रथ
में स्थित पुरुष को दिकृचक्रो में क्रमश: भ्रमण उत्पन्न होता है अथवा दौड़ रहे रथ के वेग से दिकुमोह
उत्पन्न होता है, वैसे ही भ्रान्तिवश जगत् उत्पन्न है, अत: इस प्रकार के मिथ्या भ्रमणशील जगत् में
उत्कर्षप्रयुक्त अपकर्ष कथा ही अप्रसिद्ध है । अथवा आशाएँ आशाओं की चोरी नहीं करती, अतः
आत्मवेत्ता किसी की भी चाहना नहीं करता, क्योंकि जगत् भ्रममात्र है, इस जगत् में ऐसी कोई
पुरुषार्थस्वरूप वस्तु नहीं है, जो चाहने योग्य हो, अतः आप आशाओं से कुछ भी सम्बन्ध मत रखिये,
इस पक्ष में शेष अंश पूर्व की तरह समझ लेना चाहिए