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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

मुक्तौ राघव लोकेऽस्मिन्प्राप्तिरस्ति सदैव हि । प्रवृत्त्या हि विवेकस्य विमुक्ता भूतकोटयः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, नैराश्य से जैसी शीतलता प्राप्त होती है, वैसी शीतलता न तो हिमालय से, न मोतियों से न कदली काण्डं से, न चन्दन से और न हिमांशु से प्राप्त होती है ॥४ ३॥ पुरुष को न तो राज्य से, न तो स्वर्ग से, न तो चन्द्रमा से, न तो वसन्त से और न कान्ता के कमनीय संसर्ग से वैसा उत्तम सुख मिलता है, जैसा निराशा से उत्तम सुख मिलता है यानी राज्य आदि की अपेक्षा निराशा ही सबसे बढ़ चढ़ कर सुख हे