Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जनकः संस्थितो राज्ये व्यवहारपरोऽपि सन् ।
विगतज्वर एवान्तरनाकुलमतिः सदा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
ये मूढ़ लोग अविचार से ही रोते है", यह जो पहले कहा था, उसी का आरम्भ में सविस्तार विचार
करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जैसे रम्य रमणी, पुत्र आदि के मुख को न देख रहे विरही पुरुष
के हृदय में म्लानता (दीनता), कृशता आदि विकृत स्वरूप को उत्पन्न करनेवाली उदासीनता निरन्तर
उत्पन्न होती है, वैसे ही प्रलय ओर सुषुप्ति मेँ अज्ञान से आवृत होने के कारण निरतिशयानन्दस्वरूप
अतएव परम प्रेमास्पद अपने स्वरूप को न देख रहे आत्मा में काम-कर्मो की वासना के परिपाक क्रम से
सृष्टि और जाग्रतकाल में चिद्विलास से सूक्ष्म, स्थूल, समष्टि ओर व्यष्टि शरीर उत्पन्न होते हैं
सर्ग सन्दर्भ
तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त चौहत्तरवाँ सर्ग प्रमाद से संसार-भ्रान्ति, प्रबोध से सदा पूर्णता तथा जीवन्मुक्त के गुणों का वर्णन ।