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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 82

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 82 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 82

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि जैसे स्री आदि विषयों का अनुभूयमान जो स्वरूप है, उससे विपरीत ही उनका तात्विक स्वरूप है, वैसे ही स्वात्मानुभव का भी परम प्रेमास्पदत्वरूप से अनुभूयमान जो आनन्दस्वरूप है, उससे विपरीत ही क्यो नहीं होगा? तो इस पर कहते हैं। जैसे गुड़ के अनुभूत स्वाद मधुर रस का अनुभूत गुड़, अनुभवकरण जिह्वा तथा अनुभव करनेवाले देवदत्त आदि के दाह, कर्तन आदि सैकड़ों प्रयत्नों से भी यह माधुर्य का अनुभव नहीं है, किन्तु तिक्तता आदिका अनुभव है" यों-अन्यथा नहीं कर सकते, वैसे ही आत्मा के तात्त्तिक आनन्दानुभव को भी अन्यथा नहीं कर सकते