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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

यत्नो यत्नेन कर्तव्यो मोक्षार्थं युक्तिपूर्वकम् । यत्नयुक्तिविहीनस्य गोष्पदं दुस्तरं भवेत् ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

आशाओं के आत्यन्तिक निरास के हेतु का अन्वेषण करने पर उसका परिज्ञान न होने के कारण मोह को प्राप्त हृए-से श्रीरामजी को देखकर पूर्वोक्त देह आदि मे अहम्‌भाव ओर ममता का परित्याग ही आत्यन्तिक नैराश्य में हेतु है, इसका आग्रहमूर्वक स्मरण करा रहे महाराज वस्निष्ठजी कहते हैं : हे महाबाहो, बोधित होने पर आप देह तथा देह-सम्बन्धी जरा आदि मेरे हैं, पूर्वोक्त काल में प्रसिद्ध ओर वर्तमान काल में प्रत्यक्ष देह मैं ही हूँ, इत्यादि रूप से मूर्खो की नाई क्यो भ्रम में पड़े हुए हैं