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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

तिर्यग्योनिष्वपि सदा विद्यन्ते कृतबुद्धयः । देवयोनिष्वपि प्राज्ञा विद्यन्ते मूर्खबुद्धयः ॥ ३२ ॥ सर्वं सर्वेण सर्वत्र सर्वथा सर्वदैव हि । संभवत्येव सर्वात्मन्यात्मन्याततरूपिणि ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मतत्त्व स्वरूप को पहचान लेनेवाला महात्मा भूतपूर्व उन तुच्छ दिवसों की पंक्तियों का स्मरण कर हँसता है, जिनमें काम-बाणों की परम्पराओं से चंचल चित्त विद्यमान था