Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
तस्मात्त्वमपि वैराग्यविवेकोदितधीरधीः ।
जीवन्मुक्तो विहर भो समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, इस जगत् मे जो लौकिक और
शास्त्रीय दान, आदान यानी धन आदि का स्वीकार, समाहार यानी संग्रहवृत्ति से कोश आदि का बढाना,
विहार यानी धनव्यय से पुत्र के साथ क्रीडन, विभव यानी वस्त्र, अलंकार आदि सम्पत्ति इत्यादि क्रियाएँ
हैं, वे आशावर्जित महापुरुष के द्वारा हँसी जाती हैं, क्योंकि उनके लिए प्रयत्न तो अत्यन्त करना पडता
है, फिर उनसे जो फल होते हैं, वे अत्यन्त तुच्छ होते हैं और परिणाम में अनर्थ के सम्पादक है, परन्तु
मूढ पुरुषों का उनमें वैसा ग्रह नहीं है, इसलिए वे हँसी के पात्र हैं, यह भाव है