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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

परमं बोधमासाद्य केचित्काननमागताः । यथा भृगुभरद्वाजविश्वामित्रशुकादयः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मेघ वर्षाकाल में बरस चुकने के कारण शरत्‌काल में गर्जन आदि से शून्य हो जाता है, वैसे ही तत्त्ववेत्ता उक्त दशा में समस्त अभिनिवेशो से शून्य हो जाता है और जैसे प्रशान्त समुद्र अपने स्वरूप में स्थित रहता है, वैसे ही वह अपने स्वरूप में ही अवस्थित रहता है