Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
बृहस्पतिर्देवगुरुर्दारार्थं चन्द्रयोध्यपि ।
आचरन्दिवि चित्रेहां मुक्त एव ह्यवस्थितः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
सब पदार्थों
को व्याप्त कर लेनेवाली अतिसूक्ष्म चिति न तो स्वतः चल है और न किसी से चलायमान होती है,
जैसे अचल मेरूपर्वत वायुओं से कम्पित नहीं होता, वैसे ही यह चिति भी प्राण आदि वायुओं से
कम्पित नहीं होती