Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
जरामरणयुद्धादिद्वत्द्वसंगरलीलया ।
चरती ह चिरं कालं मुक्तोऽपि भगवान्हरिः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उपलब्धि के अनुसार ही उत्तरोत्तर भ्रान्ति की बीजभरूत वासना भी बढ़ती जाती है यों कहते हैं।
उसमें "यह मैं आगन्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ, मैं कर्ता हू इस प्रकार की वासना, ऐसी व्यर्थ उत्पन्न होती
है, जैसे तूलाज्ञान से आवृत मरुभूमिस्थ धूप से मृगतृष्णा उत्पन्न होती है