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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 54

तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ चौवनवाँ सर्ग जलाने, जलप्लावन आदि द्वारा अपने शरीर में विष्णु शरीर की भावना कर रहे उद्दालक मुनि का विकल्पों को हटाकर समाधि में विश्राम लेना ।

82 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, विशुद्ध तथा विशाल बुद्धि से इस प्रकार निर्णय कर…
  2. Verses 2–3जिसने ॐकार का उच्चारण किया, उसको परमपद अवश्य प्राप्त हो गया, क्योकि ॐ यह अक्षर परब्रह्म क…
  3. Verse 4उद्दालक मुनि ने तब तक ॐकार का उच्चारण किया जब तक उनकी उस प्रकार से उच्चारित प्रणव ध्वनि म…
  4. Verses 5–6निर्विकल्प समाधि की स्थिति की योग्यता की सिद्धि के लिए पहले उसी प्रणव द्वार स्थूल देह का…
  5. Verse 7मुनि का रेचित प्राण वायु कहाँ ठहरा, इस पर कहते है। जिस प्रकार पक्षी घोंसले को छोडकर आकाश…
  6. Verse 8निरन्तर ब्रह्मभावना से क्या हुआ यह कहते है । प्राणों के निष्क्रमण और संघर्षं से हृदय में…
  7. Verse 9इस प्रकार प्रणव के प्रथम अंश में जितनी यह पूर्वोक्त अवस्था हुई, सब भावना से ही हुई, हठ से…
  8. Verse 10इसके अनन्तर दूसरे “उकार” अंश के अनुदात्स्वरसे गंभीर उच्चारण के समय प्रणव की समस्थिति होने…
  9. Verse 11वे प्राण न बाहर थे, न भीतर थे, न अधोभाग में थे, न ऊर्ध्वभाग में थे और न दिशाओं में थे, बा…
  10. Verse 12अग्नि शरीररूपी नगर को जलाकर बिजली की तरह क्षण भरमें शान्त हो गई, बरफ की तरह सफेद रंगवाली…
  11. Verse 13जिस अवस्था में शरीर की निश्चल एवं श्वेत हड्डियाँ मानों कपूर के चूर्ण से सुसज्जित शय्या मे…
  12. Verse 14आँधी से उड़ाई हुई हड्डियों से युक्त वह भस्म श्री महादेवजी के भस्मधारणरूपी व्रतवाले की नाई…
  13. Verse 15प्रचण्ड वायु से उड़ाई हुई वह हड्डियों से मिली हुई भस्म क्षण भर आकाश को ढक, कर शरद्‌ ऋतु क…
  14. Verse 16इस प्रकार यह जितनी भी अवस्था प्रणव के दूसरे अंश में (कुम्भक क्रम में) हुई सब भावना द्वारा…
  15. Verse 17इसके अनन्तर प्रणव के उपशान्तिप्रद तृतीय मकार क्रम में अर्थात्‌ मकारोच्चारण के समय में पूर…
  16. Verse 18इस तृतीय अवसर में, जीव चैतन्य में (जीवचित्‌ में) अर्थात्‌ जीवात्मा में भावना द्वारा भावित…
  17. Verse 19इस प्रकार गगन कोष में स्थित कुहरा शीतल मेघ भाव को प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार आकाश के म…
  18. Verses 20–21अमृतमय कलाओं के समूह से भली भाँति पूर्ण एवं धर्ममेघाख्यसमाधि की तरह प्रह्लाद से भरे हुए,…
  19. Verse 22जिस प्रकार महादेवजी के सिर पर अमृतमय गंगा की धारा गिरती है उसी प्रकार प्राणों की वह अमुतम…
  20. Verse 23जिस प्रकार मंथन करने से चंचल मन्दराचलवाले समुद्र से पारिजात वृक्ष उत्पन्न हुआ था उसी प्रक…
  21. Verse 24नारायणरूप से प्रादुर्भूत एवं कमल की तरह खिले हुए नेत्र एवं प्रसन्न मुखवाला अतएव कान्ति से…
  22. Verse 25जिस प्रकार जल का समुदाय सरोवर को एवं वसन्त ऋतु मे कोमल पत्तो को पैदा करनेवाले पार्थिव रस…
  23. Verse 26जिस प्रकार चक्राकार भँवरों से बह रही श्री गंगाजी को जल पूर्ण करते हैं उसी प्रकार प्राणों…
  24. Verse 27दहन, प्लावन आदि द्वारा विष्णु शरीररूप से उनकी उत्पत्ति कहने का प्रयोजन कहते है । जिस प्रक…
  25. Verses 28–31इसके बाद पद्मासन लगाकर उस भावमय शरीर में दढता से स्थित होकर उद्दालक मुनि ने जिस प्रकार बन…
  26. Verse 32जिस प्रकार अति शीघ्रता से बह रहे जल को पुल अर्थात्‌ बाँध रोक देता है उसी प्रकार उन्होंने…
  27. Verse 33जिस प्रकार चक्रवर्ती का प्रशस्त जन्म समय जगत्‌ का कल्याण सूचित करने के लिए शीतल, मन्द ओर…
  28. Verse 34जिस प्रकार कछुआ अपने रंगों एवं इन्द्रियो को विषयों से इस प्रकार पृथक्‌ कर देता हे । जिस प…
  29. Verse 35जिस प्रकार छोटे कुण्डे से सहसा ढकी हुई मणि दूर तक फैली हुई किरणों को छोड देती है उसी प्रक…
  30. Verse 36जिस प्रकार वृक्ष पत्रों के कोश में स्थित रस को (जल को) मार्गशीर्षं मे नष्ट कर देता है उसी…
  31. Verse 37इसके बाद जिस प्रकार मुख मेँ कसकर बोधा हुआ जलपूर्णं ओंधा (अधोमुख) बेडा अन्दर वायु के प्रवे…
  32. Verse 38जैसे मेरु अपने रत्नों के प्रकाश से पूर्ण एवं कल्पवृक्षो के पुष्पों से सुशोभित अतएव विशद श…
  33. Verse 39जैसे हाथी पकडनेवाले लोग विन्ध्याचल के गड में युक्तियों से वश में किये हुए उन्मत्त हाथी को…
  34. Verse 40जिस प्रकार शरद्‌ ऋतु में आकाश निर्मल सौम्यता को प्राप्त करता है उसी प्रकार उन्होने क्षोभ…
  35. Verse 41जिस प्रकार सामने उडते हुए मच्छरों को वायु दूर उड़ा ले जाता है उसी प्रकार ब्रह्माकार चित्त…
  36. Verse 42जिस प्रकार शूरवीर पुरुष सामने आये हुए शत्रुओं को रण में तलवार से काट डालता है उसी प्रकार…
  37. Verse 43विकल्पों के समूह का उच्छेद हो जाने पर उन्होंने अपने हृदयाकाश में चंचल, काजल की तरह काले त…
  38. Verse 44उन्होंने पवन से काजल के समान सत्त्वगुण के उद्रेक से उदित ज्ञानरूपी प्रकाशवाले अन्तःकरणरूप…
  39. Verse 45जैसे रात्रि सम्बन्धी अन्धकार के शान्त हो जाने पर कमल उदित हो रहे सूर्य से युक्त प्रातः सन…
  40. Verse 46जिस प्रकार हाथी का बच्चा स्थल कमलो के वन को छिन्न-भिन्न कर देता है उसी प्रकार उन्होने उस…
  41. Verse 47जिस प्रकार सूर्य के अस्त होने पर रात्रि में तालाब की तरगों से चंचल कमल बन्ध हो जाता है अथ…
  42. Verse 48जिस प्रकार वायु मेघ पंक्ति को, दुष्ट हाथी नीलकमलिनी को और सूर्य रात्रि को छिन्न-भिन्न कर…
  43. Verse 49जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश की ओर दृष्टि लगाये हुए पुरुष को आकाश में बालों के गोले, मयुर आ…
  44. Verse 50जिस प्रकार मेघ तमाल पुष्प को, वायु कुहरे को ओर दीपक अन्धकार को नष्ट कर देता है उसी प्रकार…
  45. Verse 51जिस प्रकार निद्रा-भंग हो जाने पर शराबी विक्षिप्त-सा (पागल-सा) हो जाता है उसी प्रकार आकाश…
  46. Verse 52जिस प्रकार सूर्य संसार से रात्रि द्वारा उत्पन्न अन्धकार को हटा देता है उसी प्रकार इस विवे…
  47. Verse 53इसके अनन्तर तेज अन्धकार, निद्रा, मोह आदि से रहित मन किसी अनिर्वचनीय अवस्था को प्राप्त करक…
  48. Verse 54हे श्रीरामचन्द्रजी, नहर द्वारा खेत में पहुँचाया गया सरोवर का जल खेत को भरकर पुल अर्थात्‌…
  49. Verse 55उसके अनन्तर, सुवर्ण जिस प्रकार नूपुर भाव को प्राप्त करता है अर्थात्‌ नूपुराकार मेँ परिणत…
  50. Verse 56इस प्रकार सविकल्प समाधि से क्रमशः इन्धनशून्य अग्नि की तरह दिन पर दिन क्षीण हो रहा उनका मन…
  51. Verse 57चित्त के चित्तत्व के निवृत्त होने पर उसमें प्रतिबिम्बित चैतन्य की बिम्बचैतन्य में एकता हो…
  52. Verse 58इस प्रकार निर्विकल्प समाधि में प्रतिष्ठित उद्दालक को समाधि के परिपाक से तत्त्वसाक्षात्कार…
  53. Verse 59इसके अनन्तर अमृत के गृहस्वरूप समुद्र की नाई उद्दालक ने बाह्य प्रपंच के दर्शन से रहित होकर…
  54. Verse 60उद्दालक ऋषि शरीर से पृथक्‌ होकर शुद्ध हुए की नाई अनिवर्चनीय अवस्थिति को प्राप्त करते हुए…
  55. Verse 61जैसे शरद्‌ ऋतु के स्वच्छ आकाश में समस्त कलाओं से परिपूर्ण चन्द्रमा स्थित होता हे । वैसे ह…
  56. Verse 62वह उद्दालक ऋषि निर्वात दीपक के सदुश कान्तिवाले, चित्रलिखित के सदृश अनन्यमनस्क, निस्तरंग स…
  57. Verse 63इसके अनन्तर इस महालोक में (परम पद में) चिरकाल तक स्थित हुए अथवा इस महाप्रकाश में चिरकाल त…
  58. Verse 64वहाँ उनके चारों ओर इन्द्रपद और सूर्य पद देनेवाले ओर अप्सराओं से निबिड सिद्धियों के बहुत स…
  59. Verse 65जैसे गंभीर बुद्धि उदारपुरुष वच्चो के विलास के साधन खिलौनों का आदर नहीं करता वैसे ही क्षोभ…
  60. Verse 66उत्तरायण के आधारभूत दिग्‌भाग में सूर्य जिस प्रकार छःमास तक रहता है उसी प्रकार उद्दालक उस…
  61. Verse 67जब सर्वोत्कृष्ट सप्तम भूमिका में स्थिति रूप जीवन्मुक्तपद को प्राप्त हुए तब वहाँ उनके पास…
  62. Verse 68उस आनन्द में चित्त का रसास्वादलक्षण परिणाम न होने से वह उद्दालक “अनानन्द' पद को प्राप्त ह…
  63. Verse 69जिस पुरुष ने स्वर्ग देख लिया उसका प्रेम पृथिवी पर किसी भोगसमाग्री मे नहीं होता उसी प्रकार…
  64. Verse 70वह सर्वोत्कृष्ट पद है, वही सर्वोत्कृष्ट शान्त गति है, वही शाश्वत कल्याण कर है, वह शिव है,…
  65. Verse 71जैसे जो पुरुष चैत्ररथ (कुबेर का उद्यान) प्राप्त कर चुके हो वे खदिर के (खैर के) उद्यान में…
  66. Verse 72जिस प्रकार राजा लोग दीनता को कुछ नहीं गिनते उसी प्रकार श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि द्…
  67. Verse 73हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, उस पद में विश्रान्ति को प्राप्त हुआ अतएव बोध को प्राप्त हुआ च…
  68. Verses 74–76जिस प्रकार सूर्य चैत्र मास में नीहार पटल (कुहरे) से दूर रहता है उसी प्रकार उद्दालक ऋषि सि…
  69. Verse 77करकमल मेँ कुशा की पवित्री के चिहवाले हमारे जैसे मुनियों को और विद्याधरियों सहित विद्याधरो…
  70. Verse 78उन सबने उन महात्मा उद्दालक मुनि से कहा : हे भगवान्‌, आप हमारे प्रणाम से अनुग्रह पूर्ण दृष…
  71. Verse 79हे भगवान्‌, आइये ओर इस विमान पर चढ़कर देवताओं के नगर को चलिये (स्वर्ग को चलिये), क्योकि स…
  72. Verse 80हे विभो, प्रलयपर्यन्त अपने वांछित और उचित भोग्य पदार्थो का उपभोग कीजिये क्योकि समस्त तपस्…
  73. Verses 81–83जिस प्रकार हाथियों के चारों ओर हथिनियाँ उसकी उपासना करती है उसी प्रकार हार एवं चँवरों को…
  74. Verse 84हे भगवान्‌, धर्म ओर अर्थ दोनों का सार काम है और काम का सार सुन्दर युवतियाँ हे । ये वारांग…
  75. Verse 85इसके अनन्तर अपने धर्म में निरत अतएव भोगों मे प्रेम न करते हुए उद्दालक मुनि की चिरकाल तक प…
  76. Verse 86जीवन्मुक्त वह मुनि वनों में और मुनियों के आश्रमों में सुखपूर्वक यथेच्छ विहार करते रहे
  77. Verses 87–88मेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय ओर विन्ध्याचल की चोटियों पर और द्वीप, उपवन, दिशा, कुंज, जंग…
  78. Verse 89उस समय से उद्दालक द्विज पर्वतों की भीतर की गुफाओं में ध्यानरूपी लीला से परमपद प्राप्ति पू…
  79. Verse 90उस समय से उद्दालक मुनि व्यवहारकाल में भी चिद्भावरूप एकत्व को प्राप्त हो समाहित चित्त ही र…
  80. Verse 91जिस प्रकार पृथिवी पर सूर्य का तेज सर्वत्र सम रहता है उसी प्रकार अन्तःकरणवृत्ति के अनुगत औ…
  81. Verse 92वह मुनि चित्सामान्य के निरन्तर अभ्यास के कारण सत्तासामान्य को प्राप्त करके अर्थात्‌ दृश्य…
  82. Verse 93इस प्रकार उक्त स्थिति को दिखाते हुए उपसंहार करते हैं । सब विक्षेपो के उपशमन होने के कारण…