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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 84

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 84

संस्कृत श्लोक

नाभ्यनन्दन्न तत्याज तां विभूतिं स धीरधीः । भो सिद्धा व्रजतेत्युक्त्वा स्वव्यापारपरोऽभवत् ॥ ८४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भगवान्‌, धर्म ओर अर्थ दोनों का सार काम है और काम का सार सुन्दर युवतियाँ हे । ये वारांगनाएँ वसन्त में मंजरी के समान स्वर्ग में ही होती हैं ॥८ २॥ इस प्रकार कह रहे इन सब अतिथियों की यथोचित पूजाकर के वे मुनि मिथ्यात्व आदि के निश्चय से (स्वर्ग और स्वर्ग के विविध भोग मिथ्या हैं इस निश्चय से) बिना किसी प्रकार के कौतूहल से बैठे रहे ॥८ ३॥ उस घैर्य पूर्ण बुद्धिवाले मुनि ने गन्धर्व ललनार्णँ आदि विभूति का न तो अभिनन्दन ही किया और न त्याग ही किया अर्थात्‌ उनसे उदासीन रहे ओर हे सिद्धो, आप लोग जाइए, ऐसा कहकर फिर अपने समाधिरूप व्यापार में लग गये