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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

ओमित्येतत्परं ब्रह्म निर्णीय स मुनिस्तदा । ॐकारोच्चारितो येन तेनाप्तं परमं पदम् ॥ २ ॥ ॐकारमकरोत्तारस्वरमूर्ध्वगतध्वनिम् । सम्यगाहतलाङ्गूलं घण्टाकुण्डमिवारवम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसने ॐकार का उच्चारण किया, उसको परमपद अवश्य प्राप्त हो गया, क्योकि ॐ यह अक्षर परब्रह्म का प्रधान नाम और अन्तरंग प्रतीक है, अत: यह अक्षर परब्रह्म ही है ऐसा निश्चय कर उद्दालक मुनि ने घण्टे के अधोभाग में लटके हुए लोहेके जीभ के आकार के लटकन को अच्छी तरह ताडन करने से घण्टे के आकाशभाग में उत्पन्न नाद की तरह ॐकार का, जिसका ऊँचा स्वर था तथा ध्वनि ऊपर को गई थी, उच्चारण किया