Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
सार्धत्र्यंशात्ममात्रस्य प्रथमेंऽशे स्फुटारवे ।
प्रणवस्य समाक्षुब्धप्राणारणितदेहके ॥ ५ ॥
रेचकाख्योऽखिलं कायं प्राणनिष्क्रमणक्रमः ।
रिक्तीचकार पीताम्बुरगस्त्य इव सागरम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्विकल्प समाधि की स्थिति की योग्यता की सिद्धि के लिए पहले उसी प्रणव द्वार स्थूल देह का
शोषण (सुखाना), दहन (जलाना), दुष्ट भस्मांशका निरसन (दूर करना), आप्लावन (क्षालन),
दूसरे दिव्य शरीर का निर्माण आदि प्रणव भावना से सम्पन्न हुआ, यह कहते है।
अर्धमात्रा सहित अकार, उकार, मकाररूप तीन अववयवाले प्रणव के प्रथम अंश उदात्त “अकार
का उच्च स्वर से तारभाव अभिव्यक्त होने पर बाहर निकलने के लिए उद्यत प्राणों द्वारा मूलाधार से
लेकर ओष्ठ पुट तक शरीर को ध्वनित करने पर रेचक नामवाले प्राण निकलने के क्रम ने जिस प्रकार
अगस्त्य ऋषि ने जल पीकर समुद्र को रिक्त कर दिया था उसी प्रकार समस्त शरीर को खाली कर दिया
अर्थात् उद्दालक मुनि ने रेचन द्वारा शरीर को सुखा दिया