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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

सौम्यतामनयन्मौनी प्राणापानजवं मुखे । श्वसनं श्रेयसे देशे प्रशस्तः समयो यथा ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार चक्रवर्ती का प्रशस्त जन्म समय जगत्‌ का कल्याण सूचित करने के लिए शीतल, मन्द ओर सुगन्ध वायु उसके जन्म देश में सम अर्थात्‌ न अतिवेग से ओर न अति मन्द चाल से बहता है उसी प्रकार उक्त ऋषि ने मौनी होकर प्राण, अपान के वेग को मुख में क्षोभ, वैषम्य आदि से रहित कर दिया