Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

चेत्यं संत्यज्य चिच्छुद्धा चित्सामान्यमथाययौ । त्यक्तवीच्यादिभेदोऽब्धिर्वाःसामान्यमिवैकधीः ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त के चित्तत्व के निवृत्त होने पर उसमें प्रतिबिम्बित चैतन्य की बिम्बचैतन्य में एकता हो गई, ऐसा कहते हैं। एक रसाकार बुद्धिवाला वह जिस प्रकार तरंग आदि के भेद को छोडता हुआ समुद्र जलसामान्यरूप को प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार प्रतिबिम्ब वृत््याकार को छोड़ कर शुद्ध चित्‌ (स्वप्रकाशात्मक ब्रह्म) सर्वसाक्षिचित्सामान्यरूप को प्राप्त हो गया