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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

ओमुच्चारयतस्तस्य संवित्तत्त्वे तदुन्मुखे । यावदोंकारमूर्धस्थे वितते विमलात्मनि ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उद्दालक मुनि ने तब तक ॐकार का उच्चारण किया जब तक उनकी उस प्रकार से उच्चारित प्रणव ध्वनि मूलाधार से उठकर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त परिव्याप्त न हुई और उनके संवित्‌तत््व (ॐकाराकारबुद्धि- तत्त्व) और जीवतत्त्व (जीवाख्यचैतन्य यानी अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य) अर्द्धमात्रा के उच्चारण के बाद यानी अर्धमात्रोच्चारण का उपशम होने पर जो निरंश कूटस्थ चैतन्य (ब्रह्मचैतन्य) अनुभूति में अभिव्यक्त होता है, उसी ब्रह्मचैतन्य के अभिमुख न हो गये