Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ततस्तृतीयावसरे प्रणवस्योपशान्तिदे ।
पूरणप्रपूरको नाम प्राणानामभवत्क्रमः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके अनन्तर प्रणव के उपशान्तिप्रद तृतीय मकार क्रम में अर्थात्
मकारोच्चारण के समय में पूरण करने के कारण प्राणों का 'पूरक' नाम का क्रम उत्पन्न हुआ। (यद्यपि
रेचक, कुम्भक और पूरक समग्र प्रणव के ही साधन सिद्ध है तथापि रेचक में प्रथम भाग का ही विस्तार
किया जाता है कुम्भक में मध्यभाग का और पूरक में चरम भाग का (अन्तिम भाग का), क्योकि कण्ठ से
निकलते हुए प्राणवायु से कण्ठ स्थानीय अकार भागकी ही अभिव्यक्ति होती है, संकुचित हो रहे ओष्ठों
के उकार भाग की और ओष्ठों के सम्पुटित होने पर मकार भाग की अभिव्यक्ति होती है। मकार भागकी
अभिव्यक्ति के समय प्राणवायु यद्यपि पुनः प्रवेश करता है, तो भी उसमें प्रणव के संस्कार का ही
अनुवर्तन होता है, इसलिए तत्-तद् भाग के अवसर विभाग की उक्ति है, ऐसा समझना चाहिये)