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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 28-30

संस्कृत श्लोक

अथ पद्मासनगतः कृत्वा देहे स्थितिं दृढम् । आलान इव मातङ्गं निबद्ध्येन्द्रियपञ्चकम् ॥ २८ ॥ निर्विकल्पसमाध्यर्थं व्यवसायमुपाददे । स्वभावं स्वच्छतां नेतुं शरत्काल इवामलम् ॥ २९ ॥ प्रशान्तवातहरिणमाशादिगणगामिनम् । चिन्तया हृदयं निन्ये दूराद्रज्ज्वेव कीलकम् ॥ ३० ॥ धावमानमधो मत्तं चित्तं विमलमाकुलम् । बलात्संरोधयामास सेतुर्जलमिव द्रुतम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके बाद पद्मासन लगाकर उस भावमय शरीर में दढता से स्थित होकर उद्दालक मुनि ने जिस प्रकार बन्धन स्तम्भ में हाथी को बाधते हैं उसी प्रकार देह में पाँचों इन्द्रियों को बोधिकर निर्विकल्प समाधि के लिए तथा मन को, जिसमें प्राणायाम द्वारा प्राणवायुरूपी मृग शान्त हो चुके थे और जो आशा, लोभ, तृष्णा, उत्कण्ठा, प्रतीक्षा आदि के पीछे-पीछे दौड़नेवाला था उसे स्वच्छ बनाने के लिए ऐसे उद्योग किया जैसे कि शरत्काल शान्त मृगवाले तथा दिशाओं में फैले हुए अपने निर्मल स्वभाव को स्वच्छ करने के लिए उद्योग करता है। परन्तु इस अवस्था में जिस प्रकार ढीले गढ़े हुए अश्व आदि बाँधने के घँटे को अश्व आदि से खींची गई रस्सी उखाड़ कर खींच लेती है उसी प्रकार पूर्वानुभूत घर, खेत, पुत्र, मित्र आदि की चिन्ता ने उनके मन को दूर आकृष्ट किया